॥ शाकाहार जीवन का आधार ॥

कल्पना कीजिए ....🤔

इस धरती पर मनुष्य जाति से भी विकसित कोई दूसरे ग्रह की जाति हमला कर दे और वो बुद्धि में, बल में, विज्ञान में, तकनीक आदि में आपसे हजार गुना शक्तिशाली हो और आप उनके सामने वैसे ही निरीह और बेबस हो जैसे पशु आपके सामने हैं।

अब वो पूरी मनुष्य जाति को अपने जीभ के स्वाद के लिए वैसे ही काटकर खाने लगे जैसे आप पशुओं को खाते हो।

आपके बच्चों का कोमल मांस उनके रेस्त्रां में ऊंचे दामों पर बिके और आपकी आंखों के सामने आपके बच्चों को काटा जाए।


उनका स्वयं लिखित संविधान हो और उसमें ये प्रावधान हो कि मनुष्य जाति को भोजन के रूप में खाना उनका मूलभूत अधिकार है क्योंकि वो आपसे अधिक विकसित सभ्यता है और उनके संविधान में आपकी जीवेष्णा के प्रति कोई सहानुभूति न हो जैसे मनुष्य निर्मित संविधान में पशुओं के लिए नही है।

वो इस धरती पर मनुष्य जाति को काटने के लिए सुनियोजित आधुनिक बूचड़खाने खोले और मनुष्य के मांस का बन्द डिब्बों में अपने ग्रह पर निर्यात करे और उनके ग्रह के अर्थशास्त्री अपने लैपटॉप पर अंगुली चलाते हुए अखबारों में ये सम्पादकीय लिखे कि इससे हमारी अर्थव्यवस्था व जी डी पी ग्रो हो रही है, मनुष्य का मांस प्रोटीन का श्रेष्ठ जरिया है आदि आदि....

उनके अपने कोई धार्मिक त्यौहार भी हो जहां सामुहिक रूप से मनुष्यों को जंजीरों में जकड़कर उनकी हत्या की जाए और फिर मनुष्य के मांस को एक दूसरे की प्लेट में परोसते हुए, गले मिला जाए व सोशल मीडिया पर मुबारकबाद भी दी जाए।

पूरी मनुष्य जाति पिंजरों में बंद, चुपचाप अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा करें, उसके हाथ पैर बंधे हो और आपको, आपके बच्चों व महिलाओं को सिर्फ इसलिए काटकर खाया जाए कि आप बुद्धि बल में उनसे कमतर हैं।


सोचकर देखिए आपकी आत्मा कांप उठेगी जबकि मनुष्य जाति निर्लज्जता के साथ, सदियों से पशु जाति के साथ यही तो करती आ रही है, इस ब्रह्मांड में अगर कोई सबसे अधिक अनैतिक, पापी, बलात्कारी, दुराचारी, निर्लज्ज, लालची, घटिया कोई जाति है तो वो मनुष्य जाति ही है।
इसमें मुझे तो कोई संदेह नही है!

सत्य तो यह है कि विकास की जो परिभाषा है।
समाप्त होने लगी अब उन जीवो की आशा है॥

थे जो इस धरा के समान अधिकारी।
कट रहे हैं वो ही जीव अब बारी बारी॥

दिन दूर नहीं जब मानव मानव को खाएगा।
विनाश की उस ज्वाला में हर कोई जल जाएगा॥

बहुत देर हो चुकी होगी तब तक।
ज्ञान होगा चूक का जब तक॥

हर मनुष्य आज बिमार है।
चेतो! नहीं तो चिता तैयार है॥

अब तो प्रण लेना ही होगा।
तब ही कुछ अच्छा होगा॥

सब जीव है परमात्मा के अंश।
शाकाहार से ही बढ़ेगा सबका वंश॥

इस लेख से यदि एक भी व्यक्ति शाकाहार अपनाता है तो मैं अपने आप को परम सौभाग्यशाली समझुंगा।

और आपकी भी जिम्मेदारी है कि इस लेख को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं और अपने सुझाव कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

धन्यवाद!🙏🚩




शब्द (power of words)

शब्द है मिश्री से भी मीठा, 
शब्द रिश्तों को आपस में है समेटा।
शब्द का संवाद, 
उत्पन्न करता बड़ा विवाद॥

शब्द भी ऐसे तीखे, 
मिरचे भी पड़ जाए फीके। 
शब्द अंगार लगाता, 
आपस में खूब लड़वाता। 
शब्द का संवाद, 
सब कर देता बर्बाद॥

शब्द है नीम से भी कड़वी चीज,
भुला देती है सारी तमीज़।
शब्द है बड़ा करामाती, 
शब्द है खूब शरारती। 
शब्द का संवाद, 
करवाता है जघन्य अपराध॥

शब्द ऐसे कड़कते कि बिजली भी घबराए, 
शब्द ऐसे कठोर कि पत्थर भी शरमाए। 
शब्द मे है ऐसी धार, 
जो हासिल न कर पाए तलवार। 
शब्द कर देता ऐसा वार, 
जिससे बिखर जाते हैं परिवार। 
शब्द का ही संवाद, 
जिससे बना जातिवाद॥

शब्द के बल से सभी थर्राए, 
शब्द ही है जो कहर बरपाए । 
शब्द पैदा करता है लोगों मे फूट, 
शब्द ही फैलाता सत्य व झूठ।
स्थापित करे ऐसे शब्द का संवाद, 
जिससे विकसित हो स्वस्थ्य समाजवाद॥

शब्द हमें यह संदेश है देता, 
उपयुक्त शब्द के उपयोग से बनो विजेता। 
वैसे तो शब्द का संवाद, 
अभिव्यक्ति के नाम से है आजाद॥

शिवम् सेवानाथ तिवारी "सुरज"


वस्त्र की कहानी (story of clothes)


आज की बात नहीं यह लाखों साल पुरानी,
शुरू हुआ मानव जीवन तब से शुरू मेरी कहानी।

मानव हुआ जब धरती पर उत्पन्न, 
लगी भूख जब खोजा उसने भोजन व अन्न।
परंतु वर्षा, शरद व ग्रीष्म की जलवायु, 
महसूस कर रही थी मानव की स्नायु।
ऋतुओं से सुरक्षा हेतु मानव ने जब ठानी, 
तब से शुरू मेरी कहानी ॥

प्रथम रूप में मेरे मानव ने किया उपयोग पत्ता व खाल, 
इस रूप में मै बना मानव तन की रक्षा का ढाल। 
लंबा वक्त गुजारा इस रूप में मैने, 
किंतु कुछ हटकर सोचा तब मानव ने।
कालांतर उसने खोजी कपास की घानी, 
तब शुरू हुईं मेरे नए रूप कि कहानी ॥

विकास की आँधी चली जब जोरो में, 
कपास का रूप बदल गया तब डोरो में। 
मानव ने डोरो को आपस मे बुना,
और जग ने मेरा एक नया रूप चुना।
किया सदुपयोग मेरा तब समझा मानव है ज्ञानी, 
फिर क्या! नए युग में पहुंची मेरी कहानी ॥


बदला युग और बदली मेरी काया, 
कपास के अलावा रेशम, मखमल मानव मन भाया। 
समय समय में उसने खोजे पदार्थ बहुत सारे, 
जिनका उपयोग कर मुझे दिए रूप बहुत ही न्यारे।
इसके बाद क्या दुनिया हुई मेरी दिवानी, 
यूँ आगे बढ़ी मेरे विकास की कहानी ॥

मानव ने उस दौर में मेरा किया अधिक उत्पाद, 
मेरी विक्री कर मानव को लग गया धन का स्वाद। 
मेरी ऊँची दर से करने लगा व्यापार,
व्यापारी के लिए था मैं मोती का हार। 
नया रूप पाकर उफान पर थी मेरी जवानी, 
चरम पर पहुंची मेरे जीवन की कहानी ॥

मेरे जीवन के इस सफर के काल में, 
मानव फसता गया असमानता के जाल मे।
पहनावे को देख वह समझा खुद में अन्तर, 
जिससे मानव समाज में संघर्ष होते रहे निरंतर। 
उस वक्त मै समझा मानव है कितना अभिमानी, 
त्यों शुरू हुई मेरे जीवन के संघर्ष की कहानी ॥

आज समाज विकसित हो रहा तीव गति पर, 
मेरी जिंदगी टिकी है मानव की सहमति पर। 
किसी ने मेरे आकार को कर दिया है बेहद छोटा, 
तो कइयों ने मेरे रूप को कर दिया है खोटा। 
फैशन की दुनिया ने की मेरे साथ बड़ी शैतानी, 
अब उतार पर हैं मेरी कहानी ॥ 

ऐसी स्थिति में पड़ा हूँ मैं आज, 
जहाँ मानव में बची नहीं है लाज। 
मेरे जीवन की स्थिति बेहद जर्जर, 
मेरा भविष्य आप लोगो पर निर्भर।
बहुत खुशी हुई मुझे जो आप सुने मेरी जुबानी, 
संक्षेप में मेरी यही है कहानी ॥


शिवम् सेवानाथ तिवारी

भारतीय शिक्षा व्यवस्था : तब और अब (Indian Education System) भाग :१

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेणसंस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
॥ जय माँ सरस्वती 🌷🙏🏻॥

"शिक्षा" जो सही मायने में मानव जीवन को सहज व सार्थक बनाने के लिए महत्वपूर्ण साधन है। प्रकृति की उत्पत्ति से ही शिक्षा का उदय होता रहा हैं। सृष्टि की रचना के उपरांत ब्रम्हांड के गूढ़ रहस्यों, जीवन यापन करने के तौर तरीकों, प्रकृति के रहस्यों जैसे अनन्य महत्वपूर्ण ज्ञान मनुष्य को उपहार स्वरुप श्री ब्रम्हा जी के द्वारा वेदों के रूप में प्राप्त हुए। वेद सही मायने में सांसारिक जीवन के साथ साथ आध्यात्मिक जीवन की शिक्षा देते हैं।
आज हम इन्हीं तथ्यों को समझ कर शिक्षा के स्वरुप, शिक्षा की आवश्यकता, प्राचीन परम्परागत पद्धति, आधुनिक समय की शिक्षा व्यवस्था व त्रुटियों के संबंध में इस लेख के माध्यम से प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे।

"शिक्षा" अर्थात सीखना। जब कोई जानकारी मनुष्य को कुछ सीख प्रदान करती हैं तब इसका सीधा सा तात्पर्य यह है कि उसे शिक्षा की अनुभूति हुईं हैं। 
यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि शिक्षा एवं विद्या दोनों ही भिन्न प्रकार के मार्ग हैं  ज्ञान अर्जित करने के लिए।  जहाँ शिक्षा प्रयोगात्मक (Practical) हैं तो वहीं विद्या सैद्धांतिक (Theoretical) हैं।
जहाँ विद्या का अर्थ है जानना, वहीं शिक्षा का अर्थ सिखना
यहाँ एक उदाहरण से समझते हैं कि इन दोनों को आसान भाषा में कैसे समझे।
जब किसी बालक का जन्म होता तो वह धीरे धीरे विकास करता हैं, बोलना सिखता है, चलना सीखता है, खाना खाने सीखता है अर्थात वह शिक्षा ग्रहण कर रहा है, जब वह बाल्यावस्था में विकास कर रहा होता है तो उसे विद्यालय में प्रवेश दिलवाया जाता है अर्थात उसे विद्या की प्राप्ति जो कि लिखित, मौखिक रूप से करवाई जाती हैं। इसीलिए कहाँ जाता है कि माता बालक की पहली शिक्षक होती हैं, क्योंकि वह हमें शुद्ध आचरण, आहार, आदत, सही गलत की शिक्षा देती हैं। यह सब शिक्षा एक व्यावहारिक जीवन (Practical life) के रूप में सीखने को मिलती हैं। तो वहीं ज्ञान शब्द भी शिक्षा की अनुरूप ही है, जहां विद्या का अर्थ जानना हैं तो ज्ञान का अर्थ हैं जान लेना अर्थात उस विद्या, रहस्य को अपने अन्तःकरण से समझ लेना जिससे उसे समझने में कोई भेद न रह पाए। यहाँ ज्ञान का संक्षिप्त परिचय यह है कि विद्या या शिक्षा को अपने जीवन में उपयोग करना। उदाहरण के लिए यदि कोई बालक कोई नई पुस्तक पढ़ना प्रारंभ करता हैं तो सर्वप्रथम उसे उस पुस्तक के बारे अधिक जानकारी नहीं होती जैसे जैसे वह आगे पढ़ते जाता है तो उसे उस पुस्तक के बारे अधिक जानकारी होने लगती है, जब वह पुस्तक को अंत तक पढ़ लेता है तो उसे उस पुस्तक की विद्या प्राप्त हो जाती है जिसे वह परीक्षा में लिखकर उत्तीर्ण हो जाएगा। लेकिन जब वहीं पुस्तक की जानकारी अपने जीवन में सदुपयोग करेगा अर्थात वह उस पुस्तक का ज्ञानी हैं।
शिक्षा की आवश्यकता
आखिर शिक्षा आवश्यक क्यूँ है? 
क्या बगैर ज्ञान के जीवन असंभव है?
जैसा कि हम जानते हैं मनुष्य सृष्टि की संरचना का एक अमूल्य उपहार है, चौरासी लाख योनियों में सबसे उत्तम काया मानुष तन ही हैं, जिसमें परमपिता परमेश्वर ने मस्तिष्क के रूप अपार बौध्दिक क्षमता प्रदान की है जो किसी अन्य जीव जंतु में नहीं हैं।
इसका सीधा सा तात्पर्य यह है कि मनुष्य के ऊपर एक जिम्मेदारी है जो उसे इसी बौद्धिक संपदा से निर्वहन करना है, यह तभी संभव हो सकता है जब सही शिक्षा, ज्ञान, विद्या उसे प्राप्त हो। प्रकृति में संतुलन बनाए रखना, सभी जीव जंतु के प्रति आदर भाव यह सब कुछ उसे अपने बड़ो, गुरुओ से शिक्षा के माध्यम से ही प्राप्त होगा।
विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् ।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥
विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म, और धर्म से सुख प्राप्त होता है । मनुष्य तन में सुख दुःख आते जाते रहते हैं, अज्ञानता बढ़ जाए तो दुःख हावी हो जाता है, ज्ञान के प्रवाह से सुख आ जाता है। ज्ञान ही हैं जो मनुष्य के कर्म तय किया करते हैं। 
शिक्षा, ज्ञान, विद्या एक ऐसा शस्त्र है जिससे किसी भी परिस्थिति का सामना किया जा सकता है। 

प्राचीन शिक्षा पद्धति :
यदि प्राचीन शिक्षा पद्धति का आज के शिक्षा व्यवस्था के तुलना करें तो आकाश पाताल का अन्तर है। प्राचीन भारत में शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण स्थान था। गुरु शिष्य की परंपरा जहां शिक्षा अर्थात संपूर्ण जीवन जीने की कला का ज्ञान प्रदान करना। विद्या दान करना बहुत बड़ा पुण्य कर्म समझा जाता था। 
जहां शिष्य ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए परिवार से दूर गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे। गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर लेते थे। गुरु माता पिता के समान पूज्य थे। 
गुरु भी ऐसे की किसी का न दबाव, न ही कोई मोह माया। भिक्षा माँगकर जीवन यापन करते थे। राजा का पुत्र भी उनके लिए वैसा ही होता जैसे गुरुकुल के अन्य शिष्य। 
ऋषि मुनियों का पूरा जीवन वैज्ञानिक पद्दति के अनुरूप होता था। न कोई विलासिता न कोई लोभ, सही मायने में उनका जीवन इस कथन का सार्थक था, कि सादा जीवन उच्च विचार। नगर से सुदूर वन के मध्य में आश्रम स्थित होते थे बड़े से बड़ा अनुसंधान साधारण से दिखने वाले आश्रम में होते थे। एक से एक रथी महारथी, एक से एक ज्ञानी, बलशाली, पराक्रमी, तेज तर्रार, राजनीतिज्ञ, बुद्धिमान, कुशल प्रतिभाशाली व्यक्ति इन्हीं गुरुकुलो द्वारा तराशे गए व्यक्तित्व थे जो इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों से विभूषित हैं। 
गुरुकुल जो अपने आप में एक अलग ही दुनिया थी जहां कितना भी बुद्धिहीन बालक एक बार प्रवेश कर जाता था तो वह जब बाहर निकलता तो एक अनमोल रत्न की भाँति होता था जहां उसके ज्ञान कोई सीमा नहीं होती थी।
अमीर गरीब, जात पात, ऊँच नीच, ये सारी सीमाएँ यही आकर समाप्त हो जाती थी। 
हर चीज के लिए नियम कायदे थे, दिनचर्या, ऋतुचर्या यहा तक जीवन के सारे पाठ पढ़ाए जाते थे।
चौसठ विद्या, सोलह कलाओं की शिक्षा गुरुकुल में ही प्रदान की जाती थी।
जो इस प्रकार हैं :-
  कला :-१.अन्नमया, २.प्राणमया, ३.मनोमया, ४.विज्ञानमया, ५.आनंदमया, ६.अतिशयिनी, ७.विपरिनाभिमी, ८.संक्रमिनी, ९.प्रभवि, १०.कुंथिनी, ११.विकासिनी, १२.मर्यदिनी, १३.सन्हालादिनी, १४.आह्लादिनी, १५.परिपूर्ण और १६.स्वरुपवस्थित
विद्या :-
1- गानविद्या

2- वाद्य - भांति-भांति के बाजे बजाना

3- नृत्य

4- नाट्य

5- चित्रकारी

6- बेल-बूटे बनाना

7- चावल और पुष्पादि से पूजा के उपहार की रचना करना

8- फूलों की सेज बनान

9- दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना

10- मणियों की फर्श बनाना

11- शय्या-रचना (बिस्तर की सज्जा)

12- जल को बांध देना

13- विचित्र सिद्धियाँ दिखलाना

14- हार-माला आदि बनाना

15- कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना

16- कपड़े और गहने बनाना

17- फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना

18- कानों के पत्तों की रचना करना

19- सुगंध वस्तुएं-इत्र, तैल आदि बनाना

20- इंद्रजाल-जादूगरी

21- चाहे जैसा वेष धारण कर लेना

22- हाथ की फुती के काम

23- तरह-तरह खाने की वस्तुएं बनाना

24- तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना

25- सूई का काम

26- कठपुतली बनाना, नाचना

27- पहली

28- प्रतिमा आदि बनाना

29- कूटनीति

30- ग्रंथों के पढ़ाने की चातुरी

31- नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना

32- समस्यापूर्ति करना

33- पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना

34- गलीचे, दरी आदि बनाना

35- बढ़ई की कारीगरी

36- गृह आदि बनाने की कारीगरी

37- सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा

38- सोना-चांदी आदि बना लेना

39- मणियों के रंग को पहचानना

40- खानों की पहचान

41- वृक्षों की चिकित्सा

42- भेड़ा, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति

43- तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना

44- उच्चाटनकी विधि

45- केशों की सफाई का कौशल

46- मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना

47- म्लेच्छित-कुतर्क-विकल्प

48- विभिन्न देशों की भाषा का ज्ञान

49- शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना

50- नाना प्रकार के मातृकायन्त्र बनाना

51- रत्नों को नाना प्रकार के आकारों में काटना

52- सांकेतिक भाषा बनाना

53- मनमें कटकरचना करना

54- नयी-नयी बातें निकालना

55- छल से काम निकालना

56- समस्त कोशों का ज्ञान

57- समस्त छन्दों का ज्ञान

58- वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या

59- द्यू्त क्रीड़ा

60- दूरके मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण

61- बालकों के खेल

62- मन्त्रविद्या

63- विजय प्राप्त कराने वाली विद्या

64- बेताल आदि को वश में रखने की विद्या

कहते है भगवान श्री राम बारह कलाओं के ज्ञाता थे वहीं भगवान श्री कृष्ण सोलह कलाओं में निपुण थे। वहीं भगवान श्रीकृष्ण अपनी सारी शिक्षा गुरु सांदीपनि मुनि से सिर्फ दो महीने में पूर्ण कर ली थी। इसके अतिरिक्त अन्य तीन कलाओं का ज्ञान था।

हर परिवार के अपने एक कुलगुरु होते थे जिनका दायित्व ये कि परिवार को सही गलत का अन्तर बताये, बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था उन्हीं के द्वारा की जाती थी।
गुणों की खान, बाहर से कठोर, भीतर से कोमल ऐसे थें गुरुकुल गुरु देवजन। 

इस लेख के अगले भाग 2 में हम आधुनिक अर्थात आज के शिक्षा व्यवस्था या यूं कहें कि शिक्षा व्यवसाय के बारे में विस्तृत जानकारी लेकर आयेंगे, आंकड़ों का भी सहयोग लेकर ऊपर कहे गए कथन की सत्यता साबित करेंगे। 
तब तक के लिए धन्यवाद! जय श्री राम ।। 
Continue..... भाग : 2

भारत बनाम चीन (India vs China) भाग : १

विनय न मानत जलधि जड़,
गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब,
भय बिन होय न प्रीत॥

उपर्युक्त दोहा श्री तुलसीदास जी महाराज ने श्रीरामचरितमानस में श्री रामचंद्र भगवान के समुद्र स्तुति के अवसर पर लिखा है। अर्थात श्री राम भगवान लगातार तीन दिन तक समुद्र देव की स्तुति करते रहे कि हे समुद्र देव! हमें लंका तक जाने का मार्ग प्रदान करें किंतु जड़ समुद्र अभिमान के कारण भगवान को भी भाव न दिया जिस से क्रुद्ध होकर भगवान श्री रामचंद्र ने समुद्र को ही सुखा डालने की प्रण किया और अपने धनुष पर बाण चढ़ा दिया जिसके उपरांत तीनों लोकों में एक भयंकर सा वातावरण बन गया और तभी समुद्र देव प्रकट हुए। 
प्रस्तुत प्रकरण में तुलसीदास जी महाराज बताना चाहते हैं कि भय अर्थात डर के द्वारा ही लगाव, प्रेम, स्नेह होता है अर्थात व्यक्ति जब स्वयं को अभिमानवश ताकतवर और सामने वाले व्यक्ति को तुच्छ एवं निर्बल समझने लगे तो उसे भय दिखाना ही उचित होगा जिससे वो आपकी शक्तियों का प्रभाव देख सके और वैमनस्य का भाव त्याग प्रेम का भाव रख सके। 

अब हम आते हैं असली मुद्दे पर। जी हाँ, जिसके लिए हम यह लेख लिख रहे हैं। आज  यहीं स्थिति दो महाशक्तियों में उत्पन्न हुए हैं। दोनों अपने आप में महाशक्ति हैं, और दोनों में ही विश्व गुरु बनने के लिए होड़ लगी है। 
जहां एक महाशक्ति दूसरे को निर्बल व कमजोर समझ रही है वो भी अधिक अभिमान के कारण, वहीं दूसरी तरफ दूसरी महाशक्ति "वसुधैव कुटुम्बकम" के भाव से जियो और जीने दो का मार्ग अपनाए हुए है जो विश्व की प्राचीनतम संस्कृति को संजोए हुए है जो मानवता को ही अपना धर्म समझता है। 
जी हां, हम बात कर रहे हैं अपने महान भारत देश एवं चीन की । वही तुच्छ चीन जो मानवता के लिए अभिशाप बना हुआ है जो प्रकृति का शत्रु सिद्ध हो रहा है जो मानव के सारी गुणों को भूल कर विस्तारवादी नीति अपना कर पूरे मानव समाज को खतरे में डाल दिया हैं। आज चीन और भारत के बीच जो भी परिस्थिति उत्पन्न हुई है उसका एक ही दोषी है और वह चीन। 
चीन की विस्तारवादी सोच ही आज के आधुनिक युग में भी निर्बल व गरीब देशों को अपना उपनिवेश बनाने हेतु ना जाने कितने हथकंडे अपना रहा है। छोटे देशों को साम दाम दंड भेद के द्वारा हथियाने की निरंतर कोशिश कर रहा है और अपने पड़ोसी देशों से लगातार समस्या उत्पन्न कर रहा है। भारत उन्हीं में से एक हैं। आजादी के समय भारत की कोई भी उत्तरी सीमा चीन से नहीं लगती थी, सिवाय तिब्बत के किंतु भारत की कमजोर भविष्य के प्रति सोच एवं नीति आज भारत को चीन का पड़ोसी देश के साथ साथ एक खतरनाक शत्रु भी बना दिया। 
यह पहला मौका नहीं है जब चीन अपने विस्तारवादी नीति के लिए भारत से जानबूझकर युद्ध करने को उद्धत है। आजादी के बाद चीन एक बहुत ही बड़ा भूभाग जोकि भारत का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था आज चीन उसे अपने कब्जे में ले लिया है। अक्साई चीन उन्हीं में से एक हैं। तिब्बत हांगकांग ताइवान ना जाने से कितने अन्य विवादास्पद मुद्दे हैं जिससे चीन अपनी विस्तारवादी नीति के चलते उनका दमन करना चाहता है और उन्हें हथियाना चाहता है।
अभी दुनिया में चीन द्वारा दिए गए एक घाव भरा नहीं कि चीन एक नया ज़ख्म देने की फिराक में हैं। 
आज जब विश्व के तमाम देश कोरोना से उबरने के लिए अपने नागरिकों को स्वास्थ्य व बुनियादी सुविधाओं को प्रदान करने के लिए संघर्ष  कर रहे हैं तो वही भारत देश corona व corona के उत्पादक देश से संघर्ष कर रहा है। 
इसका सीधा सा अर्थ यह है कि चीन अपने पापों को धोने के लिए भारत से बेवजह युद्ध करना चाहता है अर्थात चीन दुनिया के दिमाग से उसके द्वारा फैलाए गए कोरोना वायरस का मुद्दा हटाना चाहते हैं और खुद को दूध का धुला साबित करना चाहता है। चीन की यह सोची समझी रणनीति है जिसके द्वारा एक तीर से कई निशाने साधना चाहता है पहला यह कि दुनिया भूल जाएगी कि कोरोना उसने फैलाया है।
दूसरा यह कि  चाइना से निकलने वाली कंपनियां भारत में अपना व्यवसाय ना स्थापित कर पाए अर्थात युद्ध की स्थिति का निर्माण कर कंपनियों के मन में भय पैदा करना, जिससे कोई भी कंपनी भारत में अपना व्यवसाय न स्थापित कर पाए। 
चीन जो अपने आप में एक रहस्यमई देश है जो बाहरी दुनिया से अपने आप को अलग रखने हेतु एवं दुनिया को अपना गुलाम बनाने हेतु निरंतर नए नए हथकंडे अपना रहा है। चीन में मुख्य रूप से कम्युनिस्टवादी सोच हावी है अपने ही लोगों पर मनमाने एवं जबरदस्ती शासन करना चीन की नीति रही हैं। 
 वैसे तो चीन भारत  के बाद ही स्वतंत्र हुआ है परंतु चीन आज भारत से कई गुना आगे तक विकास कर चुका है। आर्थिक मामले में भी चीन हमसे बहुत आगे हैं। टेक्नोलॉजी एवं व्यापार में चीन विश्व का एक बहुत अहम देश हैं। वहीं भारत आजादी के बाद बहुत ही सुस्त गति से विकास कर पाया।  परिवारवाद, भ्रष्टाचार, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, नीतियों का अभाव भारत बहुत ही पिछड़ा कर दिया। इन्हीं सब कारणों से भारत का वर्चस्व विश्व पटल कमजोर पड़ गया। जब विश्व के तमाम देश आर्थिक महाशक्ति बनने की होड़ में लगे थे तो भारत में सत्ता का संघर्ष चल रहा था। इसी सब का फायदा उठा कर चीन हमें लगातार ज़ख्म देता रहा हैं। अभी विभाजन का मंज़र सब की आंखों के सामने ही था कि चाइना 1962 में भारत का एक बड़ा भू खंड कब्जा कर लेता है और हम सिर्फ हिंदी चीनी भाई भाई करते रह गए। लेकिन चीन यही नहीं रुका उसने भारत से लगने वालीं प्रत्येक सीमा पर रार करने लगा, कभी अरुणाचल तो कभी हिमाचल तो कभी लद्दाख। जबकि भारत में सत्ता की डोर अधिकतर एक ही पार्टी या कहें एक ही परिवार के हाथ में थी।
आज के इस कोरोना काल में जब कुछ हद तक चीन विश्व पटल पर कमजोर पड़ने लगा है वह भी सिर्फ उसके द्वारा फैलाए गए व छुपाये गए कोरोंना के कारण। चीन ने कोरोना से जुड़े तथ्य न सिर्फ छुपाया बल्कि गलत जानकारी देकर पूरे संसार को कोरोना से ग्रसित कर दिया है। जब सारे तथ्य सामने  आने लगे विश्व के तमाम देश चीन पर आरोप लगाने लगे और कोरोना के उत्पत्ति को लेकर जाँच के लिए चीन पर दबाव बनाने लगे। तमाम देशों ने तो सीधा इसे चीन की साजिश करार दिया। अमेरीका पहले ही दिन से इसे चाइना का biological अर्थात जैविक हथियार कहा। जब दुनिया को पता चल गया चीन की मानसिकता जांच का विषय है और यह भी कि कोरोना मानव निर्मित हो सकता है न कि प्राकृतिक। अभी तक बहुत सारे रिपोर्ट और रिसर्च के अंदेशे से यह मानव निर्मित लैब में विकसित किया हुआ वायरस है। जहां पूरे संसार में कोरोना देखते-देखते फैल गया किंतु चीन के वुहान से आगे उसका फैलना कैसे रुक गया।
आज अमेरिका, ब्रिटेन, इटली जैसे देश कोरोना के सामने नतमस्तक हो गए हैं, बड़ी से बड़ी विकसित अर्थव्यवस्था धराशाई हो गई हैं। इन सबके बीच भी अगर किसी अर्थव्यवस्था का सुचारू रूप से चलना पाया जाता है तो कहीं न कहीं कोरोना के पीछे उसी का हाथ हो। ऐसे में चीन का शक के दायरे में आना जरूरी है।
 आज जब पूरी दुनिया सच्चाई जानने लगी है तो चीन ध्यान भटकाने अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए जानबूझकर कर भारत से विवाद कर रहा है।
लेकिन चीन को यह बात दिमाग में रख लेना चाहिए कि भारत अब पहले वाला भारत नहीं है असल मायने में अब यहां लोकतांत्रिक सरकार हैं जहां पहले जैसी नीति नहीं रही, सन 2017 में भी डोकलाम में यही स्थिति बनी थी लेकिन कुशल कूटनीति एवं नेतृत्व की बदौलत भारत की जीत हुई।
चीन वहीं सोच रख रहा है जो वह 1962 में रखता था, किन्तु उसे यह याद रखना होगा कि नई दिल्ली असल मायने में नई शक्ति है जहां सत्ता की बागडोर एक ऐसे नेतृत्व में हैं जो पाकिस्तान जैसे धूर्त देश को दुनिया के सामने नंगा कर दिया। आज भारत दुनिया की उन देशों की सूची में शामिल जो आर्थिक, व्यापारिक एवं सैन्य शक्ति में शीर्ष पर है। भारत जो नए सत्ता के रूप में अभी तक के प्रदर्शन में खरा उतरा है विश्व के लिए एक उम्मीद है, जहां चीन जैसे देश को भी घुटने पर लाने की क्षमता है, आज भारत की कूटनीति यही रही है कि दुश्मन देश को दुनिया से अलग थलग कर देना।
यदि चीन भारत से युद्ध ही चाहता है तो चीन श्री राम की जन्मभूमि भारत को कमतर आंकने की कोशिश कदापि न करे। जिस प्रकार 15-16 जून की रात हमारे मुट्ठी भर सैनिक चीन के होश उड़ा सकते हैं तो चीन को यह समझ लेना चाहिए कि भारत का प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में बारूद हैं जो चीन को बर्बाद करने के लिए उद्धत हैं।
और यह भी याद रखना की यह युद्ध एक ही मोर्चे पर न हो कर कई मोर्चों पर लड़ा जाएगा। आर्थिक, सामाजिक, सैन्य कार्रवाई के रूप में लड़ा जाएगा।
भारत और चीन के इस युद्ध में आर्थिक बहिष्कार एक महत्वपूर्ण अंग होगा जो भारत को चीन से एक कदम आगे रखेगा और दबाव बनाने में कारगर सिद्ध होगा। 
हम इस लेख के अगले भाग २ में इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे। 
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Continues...... भाग २