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भारतीय शिक्षा व्यवस्था : तब और अब (Indian Education System) भाग :१

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेणसंस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
॥ जय माँ सरस्वती 🌷🙏🏻॥

"शिक्षा" जो सही मायने में मानव जीवन को सहज व सार्थक बनाने के लिए महत्वपूर्ण साधन है। प्रकृति की उत्पत्ति से ही शिक्षा का उदय होता रहा हैं। सृष्टि की रचना के उपरांत ब्रम्हांड के गूढ़ रहस्यों, जीवन यापन करने के तौर तरीकों, प्रकृति के रहस्यों जैसे अनन्य महत्वपूर्ण ज्ञान मनुष्य को उपहार स्वरुप श्री ब्रम्हा जी के द्वारा वेदों के रूप में प्राप्त हुए। वेद सही मायने में सांसारिक जीवन के साथ साथ आध्यात्मिक जीवन की शिक्षा देते हैं।
आज हम इन्हीं तथ्यों को समझ कर शिक्षा के स्वरुप, शिक्षा की आवश्यकता, प्राचीन परम्परागत पद्धति, आधुनिक समय की शिक्षा व्यवस्था व त्रुटियों के संबंध में इस लेख के माध्यम से प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे।

"शिक्षा" अर्थात सीखना। जब कोई जानकारी मनुष्य को कुछ सीख प्रदान करती हैं तब इसका सीधा सा तात्पर्य यह है कि उसे शिक्षा की अनुभूति हुईं हैं। 
यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि शिक्षा एवं विद्या दोनों ही भिन्न प्रकार के मार्ग हैं  ज्ञान अर्जित करने के लिए।  जहाँ शिक्षा प्रयोगात्मक (Practical) हैं तो वहीं विद्या सैद्धांतिक (Theoretical) हैं।
जहाँ विद्या का अर्थ है जानना, वहीं शिक्षा का अर्थ सिखना
यहाँ एक उदाहरण से समझते हैं कि इन दोनों को आसान भाषा में कैसे समझे।
जब किसी बालक का जन्म होता तो वह धीरे धीरे विकास करता हैं, बोलना सिखता है, चलना सीखता है, खाना खाने सीखता है अर्थात वह शिक्षा ग्रहण कर रहा है, जब वह बाल्यावस्था में विकास कर रहा होता है तो उसे विद्यालय में प्रवेश दिलवाया जाता है अर्थात उसे विद्या की प्राप्ति जो कि लिखित, मौखिक रूप से करवाई जाती हैं। इसीलिए कहाँ जाता है कि माता बालक की पहली शिक्षक होती हैं, क्योंकि वह हमें शुद्ध आचरण, आहार, आदत, सही गलत की शिक्षा देती हैं। यह सब शिक्षा एक व्यावहारिक जीवन (Practical life) के रूप में सीखने को मिलती हैं। तो वहीं ज्ञान शब्द भी शिक्षा की अनुरूप ही है, जहां विद्या का अर्थ जानना हैं तो ज्ञान का अर्थ हैं जान लेना अर्थात उस विद्या, रहस्य को अपने अन्तःकरण से समझ लेना जिससे उसे समझने में कोई भेद न रह पाए। यहाँ ज्ञान का संक्षिप्त परिचय यह है कि विद्या या शिक्षा को अपने जीवन में उपयोग करना। उदाहरण के लिए यदि कोई बालक कोई नई पुस्तक पढ़ना प्रारंभ करता हैं तो सर्वप्रथम उसे उस पुस्तक के बारे अधिक जानकारी नहीं होती जैसे जैसे वह आगे पढ़ते जाता है तो उसे उस पुस्तक के बारे अधिक जानकारी होने लगती है, जब वह पुस्तक को अंत तक पढ़ लेता है तो उसे उस पुस्तक की विद्या प्राप्त हो जाती है जिसे वह परीक्षा में लिखकर उत्तीर्ण हो जाएगा। लेकिन जब वहीं पुस्तक की जानकारी अपने जीवन में सदुपयोग करेगा अर्थात वह उस पुस्तक का ज्ञानी हैं।
शिक्षा की आवश्यकता
आखिर शिक्षा आवश्यक क्यूँ है? 
क्या बगैर ज्ञान के जीवन असंभव है?
जैसा कि हम जानते हैं मनुष्य सृष्टि की संरचना का एक अमूल्य उपहार है, चौरासी लाख योनियों में सबसे उत्तम काया मानुष तन ही हैं, जिसमें परमपिता परमेश्वर ने मस्तिष्क के रूप अपार बौध्दिक क्षमता प्रदान की है जो किसी अन्य जीव जंतु में नहीं हैं।
इसका सीधा सा तात्पर्य यह है कि मनुष्य के ऊपर एक जिम्मेदारी है जो उसे इसी बौद्धिक संपदा से निर्वहन करना है, यह तभी संभव हो सकता है जब सही शिक्षा, ज्ञान, विद्या उसे प्राप्त हो। प्रकृति में संतुलन बनाए रखना, सभी जीव जंतु के प्रति आदर भाव यह सब कुछ उसे अपने बड़ो, गुरुओ से शिक्षा के माध्यम से ही प्राप्त होगा।
विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् ।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥
विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म, और धर्म से सुख प्राप्त होता है । मनुष्य तन में सुख दुःख आते जाते रहते हैं, अज्ञानता बढ़ जाए तो दुःख हावी हो जाता है, ज्ञान के प्रवाह से सुख आ जाता है। ज्ञान ही हैं जो मनुष्य के कर्म तय किया करते हैं। 
शिक्षा, ज्ञान, विद्या एक ऐसा शस्त्र है जिससे किसी भी परिस्थिति का सामना किया जा सकता है। 

प्राचीन शिक्षा पद्धति :
यदि प्राचीन शिक्षा पद्धति का आज के शिक्षा व्यवस्था के तुलना करें तो आकाश पाताल का अन्तर है। प्राचीन भारत में शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण स्थान था। गुरु शिष्य की परंपरा जहां शिक्षा अर्थात संपूर्ण जीवन जीने की कला का ज्ञान प्रदान करना। विद्या दान करना बहुत बड़ा पुण्य कर्म समझा जाता था। 
जहां शिष्य ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए परिवार से दूर गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे। गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर लेते थे। गुरु माता पिता के समान पूज्य थे। 
गुरु भी ऐसे की किसी का न दबाव, न ही कोई मोह माया। भिक्षा माँगकर जीवन यापन करते थे। राजा का पुत्र भी उनके लिए वैसा ही होता जैसे गुरुकुल के अन्य शिष्य। 
ऋषि मुनियों का पूरा जीवन वैज्ञानिक पद्दति के अनुरूप होता था। न कोई विलासिता न कोई लोभ, सही मायने में उनका जीवन इस कथन का सार्थक था, कि सादा जीवन उच्च विचार। नगर से सुदूर वन के मध्य में आश्रम स्थित होते थे बड़े से बड़ा अनुसंधान साधारण से दिखने वाले आश्रम में होते थे। एक से एक रथी महारथी, एक से एक ज्ञानी, बलशाली, पराक्रमी, तेज तर्रार, राजनीतिज्ञ, बुद्धिमान, कुशल प्रतिभाशाली व्यक्ति इन्हीं गुरुकुलो द्वारा तराशे गए व्यक्तित्व थे जो इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों से विभूषित हैं। 
गुरुकुल जो अपने आप में एक अलग ही दुनिया थी जहां कितना भी बुद्धिहीन बालक एक बार प्रवेश कर जाता था तो वह जब बाहर निकलता तो एक अनमोल रत्न की भाँति होता था जहां उसके ज्ञान कोई सीमा नहीं होती थी।
अमीर गरीब, जात पात, ऊँच नीच, ये सारी सीमाएँ यही आकर समाप्त हो जाती थी। 
हर चीज के लिए नियम कायदे थे, दिनचर्या, ऋतुचर्या यहा तक जीवन के सारे पाठ पढ़ाए जाते थे।
चौसठ विद्या, सोलह कलाओं की शिक्षा गुरुकुल में ही प्रदान की जाती थी।
जो इस प्रकार हैं :-
  कला :-१.अन्नमया, २.प्राणमया, ३.मनोमया, ४.विज्ञानमया, ५.आनंदमया, ६.अतिशयिनी, ७.विपरिनाभिमी, ८.संक्रमिनी, ९.प्रभवि, १०.कुंथिनी, ११.विकासिनी, १२.मर्यदिनी, १३.सन्हालादिनी, १४.आह्लादिनी, १५.परिपूर्ण और १६.स्वरुपवस्थित
विद्या :-
1- गानविद्या

2- वाद्य - भांति-भांति के बाजे बजाना

3- नृत्य

4- नाट्य

5- चित्रकारी

6- बेल-बूटे बनाना

7- चावल और पुष्पादि से पूजा के उपहार की रचना करना

8- फूलों की सेज बनान

9- दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना

10- मणियों की फर्श बनाना

11- शय्या-रचना (बिस्तर की सज्जा)

12- जल को बांध देना

13- विचित्र सिद्धियाँ दिखलाना

14- हार-माला आदि बनाना

15- कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना

16- कपड़े और गहने बनाना

17- फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना

18- कानों के पत्तों की रचना करना

19- सुगंध वस्तुएं-इत्र, तैल आदि बनाना

20- इंद्रजाल-जादूगरी

21- चाहे जैसा वेष धारण कर लेना

22- हाथ की फुती के काम

23- तरह-तरह खाने की वस्तुएं बनाना

24- तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना

25- सूई का काम

26- कठपुतली बनाना, नाचना

27- पहली

28- प्रतिमा आदि बनाना

29- कूटनीति

30- ग्रंथों के पढ़ाने की चातुरी

31- नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना

32- समस्यापूर्ति करना

33- पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना

34- गलीचे, दरी आदि बनाना

35- बढ़ई की कारीगरी

36- गृह आदि बनाने की कारीगरी

37- सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा

38- सोना-चांदी आदि बना लेना

39- मणियों के रंग को पहचानना

40- खानों की पहचान

41- वृक्षों की चिकित्सा

42- भेड़ा, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति

43- तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना

44- उच्चाटनकी विधि

45- केशों की सफाई का कौशल

46- मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना

47- म्लेच्छित-कुतर्क-विकल्प

48- विभिन्न देशों की भाषा का ज्ञान

49- शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना

50- नाना प्रकार के मातृकायन्त्र बनाना

51- रत्नों को नाना प्रकार के आकारों में काटना

52- सांकेतिक भाषा बनाना

53- मनमें कटकरचना करना

54- नयी-नयी बातें निकालना

55- छल से काम निकालना

56- समस्त कोशों का ज्ञान

57- समस्त छन्दों का ज्ञान

58- वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या

59- द्यू्त क्रीड़ा

60- दूरके मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण

61- बालकों के खेल

62- मन्त्रविद्या

63- विजय प्राप्त कराने वाली विद्या

64- बेताल आदि को वश में रखने की विद्या

कहते है भगवान श्री राम बारह कलाओं के ज्ञाता थे वहीं भगवान श्री कृष्ण सोलह कलाओं में निपुण थे। वहीं भगवान श्रीकृष्ण अपनी सारी शिक्षा गुरु सांदीपनि मुनि से सिर्फ दो महीने में पूर्ण कर ली थी। इसके अतिरिक्त अन्य तीन कलाओं का ज्ञान था।

हर परिवार के अपने एक कुलगुरु होते थे जिनका दायित्व ये कि परिवार को सही गलत का अन्तर बताये, बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था उन्हीं के द्वारा की जाती थी।
गुणों की खान, बाहर से कठोर, भीतर से कोमल ऐसे थें गुरुकुल गुरु देवजन। 

इस लेख के अगले भाग 2 में हम आधुनिक अर्थात आज के शिक्षा व्यवस्था या यूं कहें कि शिक्षा व्यवसाय के बारे में विस्तृत जानकारी लेकर आयेंगे, आंकड़ों का भी सहयोग लेकर ऊपर कहे गए कथन की सत्यता साबित करेंगे। 
तब तक के लिए धन्यवाद! जय श्री राम ।। 
Continue..... भाग : 2