गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब,
भय बिन होय न प्रीत॥
उपर्युक्त दोहा श्री तुलसीदास जी महाराज ने श्रीरामचरितमानस में श्री रामचंद्र भगवान के समुद्र स्तुति के अवसर पर लिखा है। अर्थात श्री राम भगवान लगातार तीन दिन तक समुद्र देव की स्तुति करते रहे कि हे समुद्र देव! हमें लंका तक जाने का मार्ग प्रदान करें किंतु जड़ समुद्र अभिमान के कारण भगवान को भी भाव न दिया जिस से क्रुद्ध होकर भगवान श्री रामचंद्र ने समुद्र को ही सुखा डालने की प्रण किया और अपने धनुष पर बाण चढ़ा दिया जिसके उपरांत तीनों लोकों में एक भयंकर सा वातावरण बन गया और तभी समुद्र देव प्रकट हुए।
प्रस्तुत प्रकरण में तुलसीदास जी महाराज बताना चाहते हैं कि भय अर्थात डर के द्वारा ही लगाव, प्रेम, स्नेह होता है अर्थात व्यक्ति जब स्वयं को अभिमानवश ताकतवर और सामने वाले व्यक्ति को तुच्छ एवं निर्बल समझने लगे तो उसे भय दिखाना ही उचित होगा जिससे वो आपकी शक्तियों का प्रभाव देख सके और वैमनस्य का भाव त्याग प्रेम का भाव रख सके।
अब हम आते हैं असली मुद्दे पर। जी हाँ, जिसके लिए हम यह लेख लिख रहे हैं। आज यहीं स्थिति दो महाशक्तियों में उत्पन्न हुए हैं। दोनों अपने आप में महाशक्ति हैं, और दोनों में ही विश्व गुरु बनने के लिए होड़ लगी है।
जहां एक महाशक्ति दूसरे को निर्बल व कमजोर समझ रही है वो भी अधिक अभिमान के कारण, वहीं दूसरी तरफ दूसरी महाशक्ति "वसुधैव कुटुम्बकम" के भाव से जियो और जीने दो का मार्ग अपनाए हुए है जो विश्व की प्राचीनतम संस्कृति को संजोए हुए है जो मानवता को ही अपना धर्म समझता है।
जी हां, हम बात कर रहे हैं अपने महान भारत देश एवं चीन की । वही तुच्छ चीन जो मानवता के लिए अभिशाप बना हुआ है जो प्रकृति का शत्रु सिद्ध हो रहा है जो मानव के सारी गुणों को भूल कर विस्तारवादी नीति अपना कर पूरे मानव समाज को खतरे में डाल दिया हैं। आज चीन और भारत के बीच जो भी परिस्थिति उत्पन्न हुई है उसका एक ही दोषी है और वह चीन।
चीन की विस्तारवादी सोच ही आज के आधुनिक युग में भी निर्बल व गरीब देशों को अपना उपनिवेश बनाने हेतु ना जाने कितने हथकंडे अपना रहा है। छोटे देशों को साम दाम दंड भेद के द्वारा हथियाने की निरंतर कोशिश कर रहा है और अपने पड़ोसी देशों से लगातार समस्या उत्पन्न कर रहा है। भारत उन्हीं में से एक हैं। आजादी के समय भारत की कोई भी उत्तरी सीमा चीन से नहीं लगती थी, सिवाय तिब्बत के किंतु भारत की कमजोर भविष्य के प्रति सोच एवं नीति आज भारत को चीन का पड़ोसी देश के साथ साथ एक खतरनाक शत्रु भी बना दिया।
यह पहला मौका नहीं है जब चीन अपने विस्तारवादी नीति के लिए भारत से जानबूझकर युद्ध करने को उद्धत है। आजादी के बाद चीन एक बहुत ही बड़ा भूभाग जोकि भारत का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था आज चीन उसे अपने कब्जे में ले लिया है। अक्साई चीन उन्हीं में से एक हैं। तिब्बत हांगकांग ताइवान ना जाने से कितने अन्य विवादास्पद मुद्दे हैं जिससे चीन अपनी विस्तारवादी नीति के चलते उनका दमन करना चाहता है और उन्हें हथियाना चाहता है।
अभी दुनिया में चीन द्वारा दिए गए एक घाव भरा नहीं कि चीन एक नया ज़ख्म देने की फिराक में हैं।
आज जब विश्व के तमाम देश कोरोना से उबरने के लिए अपने नागरिकों को स्वास्थ्य व बुनियादी सुविधाओं को प्रदान करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो वही भारत देश corona व corona के उत्पादक देश से संघर्ष कर रहा है।
इसका सीधा सा अर्थ यह है कि चीन अपने पापों को धोने के लिए भारत से बेवजह युद्ध करना चाहता है अर्थात चीन दुनिया के दिमाग से उसके द्वारा फैलाए गए कोरोना वायरस का मुद्दा हटाना चाहते हैं और खुद को दूध का धुला साबित करना चाहता है। चीन की यह सोची समझी रणनीति है जिसके द्वारा एक तीर से कई निशाने साधना चाहता है पहला यह कि दुनिया भूल जाएगी कि कोरोना उसने फैलाया है।
दूसरा यह कि चाइना से निकलने वाली कंपनियां भारत में अपना व्यवसाय ना स्थापित कर पाए अर्थात युद्ध की स्थिति का निर्माण कर कंपनियों के मन में भय पैदा करना, जिससे कोई भी कंपनी भारत में अपना व्यवसाय न स्थापित कर पाए।
चीन जो अपने आप में एक रहस्यमई देश है जो बाहरी दुनिया से अपने आप को अलग रखने हेतु एवं दुनिया को अपना गुलाम बनाने हेतु निरंतर नए नए हथकंडे अपना रहा है। चीन में मुख्य रूप से कम्युनिस्टवादी सोच हावी है अपने ही लोगों पर मनमाने एवं जबरदस्ती शासन करना चीन की नीति रही हैं।
वैसे तो चीन भारत के बाद ही स्वतंत्र हुआ है परंतु चीन आज भारत से कई गुना आगे तक विकास कर चुका है। आर्थिक मामले में भी चीन हमसे बहुत आगे हैं। टेक्नोलॉजी एवं व्यापार में चीन विश्व का एक बहुत अहम देश हैं। वहीं भारत आजादी के बाद बहुत ही सुस्त गति से विकास कर पाया। परिवारवाद, भ्रष्टाचार, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, नीतियों का अभाव भारत बहुत ही पिछड़ा कर दिया। इन्हीं सब कारणों से भारत का वर्चस्व विश्व पटल कमजोर पड़ गया। जब विश्व के तमाम देश आर्थिक महाशक्ति बनने की होड़ में लगे थे तो भारत में सत्ता का संघर्ष चल रहा था। इसी सब का फायदा उठा कर चीन हमें लगातार ज़ख्म देता रहा हैं। अभी विभाजन का मंज़र सब की आंखों के सामने ही था कि चाइना 1962 में भारत का एक बड़ा भू खंड कब्जा कर लेता है और हम सिर्फ हिंदी चीनी भाई भाई करते रह गए। लेकिन चीन यही नहीं रुका उसने भारत से लगने वालीं प्रत्येक सीमा पर रार करने लगा, कभी अरुणाचल तो कभी हिमाचल तो कभी लद्दाख। जबकि भारत में सत्ता की डोर अधिकतर एक ही पार्टी या कहें एक ही परिवार के हाथ में थी।
आज के इस कोरोना काल में जब कुछ हद तक चीन विश्व पटल पर कमजोर पड़ने लगा है वह भी सिर्फ उसके द्वारा फैलाए गए व छुपाये गए कोरोंना के कारण। चीन ने कोरोना से जुड़े तथ्य न सिर्फ छुपाया बल्कि गलत जानकारी देकर पूरे संसार को कोरोना से ग्रसित कर दिया है। जब सारे तथ्य सामने आने लगे विश्व के तमाम देश चीन पर आरोप लगाने लगे और कोरोना के उत्पत्ति को लेकर जाँच के लिए चीन पर दबाव बनाने लगे। तमाम देशों ने तो सीधा इसे चीन की साजिश करार दिया। अमेरीका पहले ही दिन से इसे चाइना का biological अर्थात जैविक हथियार कहा। जब दुनिया को पता चल गया चीन की मानसिकता जांच का विषय है और यह भी कि कोरोना मानव निर्मित हो सकता है न कि प्राकृतिक। अभी तक बहुत सारे रिपोर्ट और रिसर्च के अंदेशे से यह मानव निर्मित लैब में विकसित किया हुआ वायरस है। जहां पूरे संसार में कोरोना देखते-देखते फैल गया किंतु चीन के वुहान से आगे उसका फैलना कैसे रुक गया।
आज अमेरिका, ब्रिटेन, इटली जैसे देश कोरोना के सामने नतमस्तक हो गए हैं, बड़ी से बड़ी विकसित अर्थव्यवस्था धराशाई हो गई हैं। इन सबके बीच भी अगर किसी अर्थव्यवस्था का सुचारू रूप से चलना पाया जाता है तो कहीं न कहीं कोरोना के पीछे उसी का हाथ हो। ऐसे में चीन का शक के दायरे में आना जरूरी है।
आज जब पूरी दुनिया सच्चाई जानने लगी है तो चीन ध्यान भटकाने अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए जानबूझकर कर भारत से विवाद कर रहा है।
लेकिन चीन को यह बात दिमाग में रख लेना चाहिए कि भारत अब पहले वाला भारत नहीं है असल मायने में अब यहां लोकतांत्रिक सरकार हैं जहां पहले जैसी नीति नहीं रही, सन 2017 में भी डोकलाम में यही स्थिति बनी थी लेकिन कुशल कूटनीति एवं नेतृत्व की बदौलत भारत की जीत हुई।
चीन वहीं सोच रख रहा है जो वह 1962 में रखता था, किन्तु उसे यह याद रखना होगा कि नई दिल्ली असल मायने में नई शक्ति है जहां सत्ता की बागडोर एक ऐसे नेतृत्व में हैं जो पाकिस्तान जैसे धूर्त देश को दुनिया के सामने नंगा कर दिया। आज भारत दुनिया की उन देशों की सूची में शामिल जो आर्थिक, व्यापारिक एवं सैन्य शक्ति में शीर्ष पर है। भारत जो नए सत्ता के रूप में अभी तक के प्रदर्शन में खरा उतरा है विश्व के लिए एक उम्मीद है, जहां चीन जैसे देश को भी घुटने पर लाने की क्षमता है, आज भारत की कूटनीति यही रही है कि दुश्मन देश को दुनिया से अलग थलग कर देना।
यदि चीन भारत से युद्ध ही चाहता है तो चीन श्री राम की जन्मभूमि भारत को कमतर आंकने की कोशिश कदापि न करे। जिस प्रकार 15-16 जून की रात हमारे मुट्ठी भर सैनिक चीन के होश उड़ा सकते हैं तो चीन को यह समझ लेना चाहिए कि भारत का प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में बारूद हैं जो चीन को बर्बाद करने के लिए उद्धत हैं।
और यह भी याद रखना की यह युद्ध एक ही मोर्चे पर न हो कर कई मोर्चों पर लड़ा जाएगा। आर्थिक, सामाजिक, सैन्य कार्रवाई के रूप में लड़ा जाएगा।
भारत और चीन के इस युद्ध में आर्थिक बहिष्कार एक महत्वपूर्ण अंग होगा जो भारत को चीन से एक कदम आगे रखेगा और दबाव बनाने में कारगर सिद्ध होगा।
हम इस लेख के अगले भाग २ में इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
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